top of page
Search
  • alpayuexpress

यूपी में पुलिस व अपराधियों के कनेक्शन से वर्दी हुई दागदार भेदियों और मतभेदों से अपनों ने ली अपने साथ




अगस्त सोमवार 31-8-2020


किरण नाई ,वरिष्ठ पत्रकार -अल्पायु एक्सप्रेस


वाराणसी उत्तर प्रदेश पुलिस की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं लें रहीं, आये दिन शहरों और गांवों से गोलीकांड की खबरें आ ही जा रहीं है,जिसपर कहीं से लगाम लगाने की पहल और परिणाम नदारद है,


बिकरू कांड के बाद से अपराधियों के पुलिस कानपुर में सीओ समेत आठ पुलिसकर्मियों की हत्या की वारदात के बाद पुलिस व अपराधी विकास दुबे के बीच जो गठजोड़ सामने आया था,उसमें अभी कुछ और नाम सामने आने बाकी हैं।


प्रकरण में दो उपनिरीक्षक जेल जा चुके हैं और एस आई टी की निगाह कई पुलिस अधिकारियों व कर्मियों की भूमिका पर है। ऐसे में सोमवार को जालसाजों से संलिप्तता में डीआईजी अरविंद सेन व डीआईजी दिनेश चंद्र दुबे के निलंबन के बाद महकमे की छवि पर और बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। पुलिस और अपराधियों के गठजोड़ में छोटों से लेकर बड़ों तक की भूमिका उजागर हो रही है।,

यूपी पुलिस के पन्ने पलटें तो यहां दागियों की कमी नहीं। राजनीतिक रसूख से लेकर निजी फायदे तक के लिए पुलिस अधिकारी व कर्मी अपने दामन को दागदार करते रहे हैं। एक के बाद एक कड़ी कार्रवाई भी उनके लिए सबक नहीं बन सकी। अपने तबादले के बावजूद दूसरों का स्थानांतरण करने के खेल में बीते दिनों एक आईपीएस अधिकारी के हाथ झुलस चुके हैं। करीब डेढ़ साल पूर्व बाराबंकी में एक ट्रेडिंग कंपनी संचालकों से 65 लाख रुपये वसूली के मामले ने भी खूब तूल पकड़ा था। तब मामला डीजीपी मुख्यालय तक पहुंचा था और आरोपित उपनिरीक्षक अनूप यादव को गिरफ्तार कर जेल भेज गया था। आरोपों से तत्कालीन एसपी बाराबंकी भी घिरे थे और उन्हें निलंबित किया गया था। हालांकि बाद में वह बहाल हो गए थे।

करीब एक साल पहले गौतमबुद्धनगर के तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण के साथी पांच आइपीएस अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों का मामला भी महकमे की खूब किरकिरी करा चुका है। उन्नाव दुष्कर्म कांड में पुलिस जिस तरह आरोपित विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की मददगार बनी थी, उसकी परतें भी सीबीआइ जांच में खुल चुकी हैं।


ये मामले भी बने थे सुर्खियां : सोशल मीडिया पर बीते दिनों झांसी के थाना मऊरानीपुर के तत्कालीन इंस्पेक्टर सुनीत कुमार सिंह का एक ऑडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह वांछित अपराधी लेखराज यादव से बातचीत कर रहे थे। इंस्पेक्टर की वांछित से एनकाउंटर को लेकर डील चल रही थी। पुलिस-अपराधी गठजोड़ के इस मामले ने काफी तूल पकड़ा था। बाद में इंस्पेक्टर सुनीत को बर्खास्त कर दिया गया था। सोशल मीडिया पर नोएडा पुलिस की वसूली का रेटचार्ट तथा वसूली को ही लेकर बाराबंकी के एक सिपाही का वीडियो भी वायरल हुआ था।


ठगी के आरोपितों को रिमांड पर लेगी पुलिस : पशुपालन विभाग के बाद खाद्य एवं आपूर्ति विभाग में टेंडर दिलाने के नाम पर करोड़ों की ठगी के मामले में पुलिस जेल में बंद आरोपितों को रिमांड पर लेगी। पुलिस की ओर से न्यायालय में इस बाबत प्रार्थना पत्र दिया गया है। पुलिस का कहना है कि मुख्य आरोपित आशीष राय दो दिन बाद न्यायालय में पेश होगा, जिसे पुलिस रिमांड पर लिया जाएगा। इसके बाद उससे गिरोह के अन्य लोगों के बारे में पूछताछ की जाएगी।

मजबूरी या लाचारी में कानून के रखवालों को खुद अपनी सुरक्षा करने में समस्या आ रही है लेकिन पुरानी कहावत है जैसा जो बोता है वैसा ही फसल काटता है।

अपराध को स्थान देने वाले सिस्टम में आम आदमी त्रस्त होकर अपराधी बना ऐसे हजारों मामले सामने आते है


और सही मायने में जब किसी अन्याय की गुहार एक आम आदमी पीडित के रूप में चौकी या थाने पर जाता है तो पछताने लग जाता है क्योकि पुलिस पीडित को भरोसे की बजाय शिकायत के बाद का हश्र पीड़ित को दुहराने की बात की जाने लगती है,


पता चलता है पीडित की शिकायत की विवेचना वही दरोगा करता है जिससे त्रस्त होकर वो थाना,सीओ या एसएसपी के पास जाता है ऐसे में अपराधी को शय देने, भला करने में दरोगा जी पीडित को ही बंद करने की बात कहते नहीं चुकते,


हाल ही में भेलूपुर थाने के विषयक एक कथित प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार द्वारा सूदखोरी का मामला बकायदे सबूत सहित दबे पांव मिडिया में तैरा जिसमें प्रतिष्ठित अखबार के पत्रकार ने वर्तमान दुर्गाकुंड चौकी प्रभारी प्रकाश सिंह का नाम लेकर बकायदे ईम डीएम कहीं जाने पर कुद्द ना बिगाड़ पाने की बात दावे से यूं तो नहीं की होगी,


पीडित की शिकायत पर एसएसपी वाराणसी ने थाने पर मुकदमा दर्ज करवा दिया पर विवेचना के लिए नियुक्त हुए वही चौकी प्रभारी जिनके नाम पर पीडित को डराया धमकाया गया ऐसे में पीडित को इंसाफ,सुरक्षा या भरोसा की चिंता होना लाजमी है,


और इस मामले में बावजूद इसके की सबूत के बिनाह पर साफ साफ अपराध में गिरफ्तारी होनी चाहिए थी उल्टा पीडित पक्ष पर भी मुकदमा दर्ज कराया जाना प्रमाणित करता है कि विवेचना नहीं रचना और योजना बन रही है परिणाम में न्याय होगा ? ये सोचना सपना है, कुल मिलाकर पीड़ित पीड़ित के रूप में ही खत्म हो जाता है पर ऐसे छोटे छोटे बल से ही अपराध का आत्मबल एक दिन वर्दी पर दाग लगाता है।

0 views0 comments
bottom of page