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आज के दिन ही 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, जानिए कैसा रहा बैंकों के 51 वर्ष का सफ़र




आज के दिन ही 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था, जानिए कैसा रहा बैंकों के 51 वर्ष का सफ़र


जुलाई सोमवार 20-7-2020


किरण नाई ,वरिष्ठ पत्रकार -अल्पायु एक्सप्रेस


''""राष्ट्रीयकरण से पूर्व देश के 14 बैंकों के पास थी देश कि 80% पूंजी , जिसे इंदिरा गांधी ने समय-समय पर सरकार का कब्जा करवाया , आज 19 जुलाई 2020 को पूरे 51 वर्ष हो चुके है"

19 जुलाई 1969 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश के 14 प्रमुख बैंकों का पहली बार राष्ट्रीयकरण किया था , साल 1969 के बाद 1980 में पुनः 6 बैंक राष्ट्रीयकृत हुए थे , आज 19 जुलाई 2020 को बैंकों के राष्ट्रीयकरण के 52 वर्ष पूरे हो चुके हैं.....

दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूरोप में केंद्रीय बैंक को सरकारों के अधीन करने के विचार ने जन्म लिया , उधर ""बैंक ऑफ़ इंग्लैंड"" का राष्ट्रीयकरण हुआ , इधर ""भारतीय रिज़र्व बैंक"" के राष्ट्रीयकरण की बात उठी जो 1949 में पूरी हो गयी , फिर 1955 में ""इम्पीरियल बैंक"" जो बाद में ""स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया"" कहलाता है सरकारी बैंक बन गया.....

आर्थिक तौर पर सरकार को लग रहा था कि ""कमर्शियल बैंक"" सामाजिक उत्थान की प्रक्रिया में सहायक नहीं हो रहे थे , बताते हैं कि इस समय देश के 14 बड़े बैंकों के पास देश की लगभग 80 फीसदी पूंजी थी , इनमें जमा पैसा उन्हीं सेक्टरों में निवेश किया जा रहा था , जहां लाभ के ज़्यादा अवसर थे , वहीं सरकार की मंशा कृषि , लघु उद्योग और निर्यात में निवेश करने की थी......

1967 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो पार्टी पर उनकी पकड़ मज़बूत नहीं थी , दूसरी तरफ एक रिपोर्ट के मुताबिक 1947 से लेकर 1955 तक 360 छोटे-मोटे बैंक डूब गए थे , जिनमें लोगों का जमा करोड़ों रूपया डूब गया था , उधर कुछ बैंक काला बाज़ारी और जमाखोरी के धंधों में पैसा लगा रहे थे , इसलिए सरकार ने इनकी कमान अपने हाथ में लेने का फैसला किया ताकि वह इन्हें सामाजिक विकास के काम में भी लगा सके ,

1967 में जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं तो लोग उन्हें कांग्रेस सिंडिकेट की ""गूंगी गुड़िया"" कहते थे , उनका झुकाव तत्कालीन सोवियत रूस की तरफ़ था , सोवियत रूस और पूर्वी यूरोप के देशों में बैंक सरकार के अधीन रहते थे , 1967 से लेकर 1973 तक ""पी.एन. हक्सर"" कांग्रेस सरकार में सबसे ताक़तवर व्यक्ति थे , और इंदिरा गांधी उनकी समझ की कायल थीं , यही से इंदिरा गांधी का भी झुकाव लेफ्ट की तरफ़ हो गया था.....


1967 में इंदिरा गांधी ने कांग्रेस पार्टी में 10 सूत्रीय कार्यक्रम पेश किया बैंकों पर सरकार का नियंत्रण , पूर्व राजे-महाराजों को मिलने वाले वित्तीय लाभ और न्यूनतम मज़दूरी का निर्धारण इसके मुख्य बिंदु थे , इंदिरा गांधी की पेशकश पर कांग्रेस पार्टी ने कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं दिखायी , और यह बात इंदिरा गांधी को यह बात नागवार गुज़री ,

इससे सिंडिकेट और इंदिरा गांधी आर-पार की लडाई के मूड में आ गए , 24 अप्रैल से 28 अप्रैल 1969 को कांग्रेस का अधिवेशन फरीदाबाद में हुआ जिसमे कांग्रेस के अध्यक्ष ""एस. निज्नल्गाप्पा"" ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण का विरोध किया था , क्योंकि उस समय संसद में कांग्रेस के पास बहुमत नहीं था और लेफ्ट ने इस बात का फायदा उठाया और अपना समर्थन देने के बदले बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए इंदिरा गांधी से समझौता कर लिया जिसके फलस्वरूप लेफ्ट समर्थित बैंक यूनियंस का वर्चस्व रहा.....

7 जुलाई 1969 ए.आई.सी.सी. बंगलौर अधिवेशन में इंदिरा गांधी ने तुरंत प्रभाव से बैंकों के राष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रख दिया , लोगों में संदेश गया कि इंदिरा गांधी गरीबों के हक की लडाई लड़ने वाला योद्धा हैं , पर अभी एक अड़चन और थी , तेज़ तर्रार राजनैतिज्ञ और तत्कालीन वित्त मंत्री ""मोरारजी देसाई"" इसमें आड़े आ रहे थे , कहा जाता है कि इंदिरा गांधी इनसे खौफ खाती थीं ,

हालांकि , इंदिरा गांधी के 10 सूत्रीय कार्यक्रम को पार्टी में पेश करने वाले ""मोरारजी देसाई"" ही थे , जो सामाजिक नजरिये से बैंकों पर सरकारी नियंत्रण के पक्षधर थे , पर वे उनके राष्ट्रीयकरण के पक्ष में नहीं थे , और 16 जुलाई 1969 को इंदिरा गांधी ने मोरारजी देसाई को वित्त मंत्री के पद से हटा दिया , अब उनका रास्ता साफ़ था , 19 जुलाई 1969 को एक आर्डिनेंस जारी करके सरकार ने देश के 14 बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया ,

जिस आर्डिनेंस के जिए किया गया वह ""बैंकिंग कम्पनीज आर्डिनेंस"" कहलाया , बाद में इसी नाम से विधेयक भी पारित हुआ और कानून बन गया , यह इंदिरा गांधी की पहली जीत थी......


राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकों की शाखाओं में बढ़ोतरी हुई , शहर से उठकर बैंक गांव-देहात की तरफ चल दिए.....

आंकड़ों के मुताबिक जुलाई 1969 को देश में बैंकों की सिर्फ 8322 शाखाएं थीं , 1994 के आते आते यह आंकड़ा 60 हज़ार को पार कर गया , इसका यह फ़ायदा हुआ कि बैंकों के पास काफी मात्रा में पैसा इकट्टा हुआ और आगे बतौर कर्ज बांटा गया , प्राथमिक सेक्टर , जिसमें छोटे उद्योग , कृषि और छोटे ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर्स शामिल थे , इन सभी को फ़ायदा हुआ......

1980 में बैकों के राष्ट्रीयकरण का दूसरा दौर चला , 19 जुलाई 1980 को देश के 6 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया.....

पिछले 6 वर्षों 2014 से लेकर आज 2020 में सरकारी बैंकों का यह डूब रहा पैसा 10% से ऊपर है , फ़ायदा लेने वालों में रसूखदार ही है , छोटे किसान , छोटेव्यापारी हाशिये पर खड़े रह गए , सच मानिए ""नरेंद्र मोदी"" ने राष्ट्रीयकरण हुए बैंकों का सरकारी करण कर दिया ,

और बैंकों के सरकारी करण से अपने पूंजीपति दोस्तों को भरपूर फायदा पहुँचाया , फायदा पहुँचने में कोई कसर नही छोड़ा......

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