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सत्य घटना पर आधारित!...यीशुपुर खंडवा ग्राम सभा की रामलीला के मंचन का 200 वर्ष पुराना इतिहास

यीशुपुर/मनिहारी/गाज़ीपुर/उत्तर प्रदेश


सत्य घटना पर आधारित!...यीशुपुर खंडवा ग्राम सभा की रामलीला के मंचन का 200 वर्ष पुराना इतिहास



आदित्य कुमार, पत्रकार,जिला संवाददाता


मनिहारी:- ब्लॉक जखनियां तहसील गाजीपुर जिला के यीशुपुर खंडवा ग्राम सभा के रामलीला के मंचन को 200 वर्ष पुराना इतिहास जो अति प्राचीन राम जानकी मंदिर ठाकुरद्वारा से जुड़ा है इतिहासकारों के द्वारा यह बात गांव के प्रबुद्ध जन बताते हैं कि 200 वर्ष पहले मूर्ति व्यापारी कोलकाता से पैसा पर मूर्तियां लादकर पैदल रास्ते होते हुए रामनगर के राजा को मूर्तियां देने हेतु कभी घना जंगल व बनारस पैदल मार्ग था ठाकुर द्वारा जो काफी रमणीय बेसो नदी तट यीशुपुर गांव से दक्षिण में स्थित है वह मूर्ति व्यापारी अपने भैसो पर लदी मूर्ति उतारकर रात्रि विश्राम करने हेतु उठा रहे थे जब सुबह फिर मूर्ति भैसे पर लादकर रामनगर हेतु चलना चाहे तो वह भैसा उठा ही नहीं और जब मूर्ति उतार देते तो वह भैसा उठ खड़ा हो जाता मूर्ति लाद कर ले जाने के दिन भर के प्रयास में असफल व्यापारी यह सूचना रामनगर के राजा को दिया और यह घटना खंडवा क्षेत्र में जंगल में आग की तरह फैल गई और पूरे गांव और क्षेत्र के लोग वहां इकट्ठा हो गए थे जो मूर्तियां देखकर अद्भुत दिव्य शक्ति का दर्शन राम लक्ष्मण और जानकी के मूर्ति में पा रहे थे और मन में भाव मूर्ति को वहीं स्थापित करने की होने लगी थी जो पारब्रह्म परमेश्वर और जानकी माता का चमत्कारी मूर्ति जीवधारी हो गई जो 100 वर्षों से ऊपर चली और इसके बाद गांव के रामलीला के अग्रदूत स्वर्गीय रामदेव सिंह ,चंद्रिका सिंह ,बच्चा सिंह, साहब सिंह, विश्वनाथ जयसवाल, राम नगीना सिंह ,गुर्जर पासवान ,मोहम्मद जमीर उल्लाह, लालचंद भट्ट ,सोमनाथ सिंह ,मारकंडे दुबे, काली प्रसाद दुबे ,कामता सिंह ,देवनाथ सिंह, रामसिंह सिंह ,चिंगी राम ,रामनाथ जायसवाल, मातबर राजभर पवार उधर कार बद्रीराम लाल चंदगुप्तादेव सिंह, मलेली सिंह ,बनारसी राम, बिंदेश्वरी दुबे ,रामाधार दुबे ,विश्वनाथ सिंह, रामनाथ मौर्य ,राजनाथ सिंह, कपिल देव दुबे हरि प्रपन्न दुबे आदि लोगों के कुशल नेतृत्व में 1958 में पहली चकबंदी के दौरान स्वर्गीय बच्चा सिंह की मूल चक को जो आज श्री पव्हारी बाबा रामलीला मंच उसे रामलीला मैदान हेतु चकबंदी में ऐलान हुआ वह रामलीला का अलग-अलग स्थानों से समिति कर एक जगह रामलीला पहिल प्राण से शुरू होकर 9 दिन नवमी का मंचन होकर दशहरा का भव्य मेला ठाकुरद्वारा में रावण दहन के उपलक्ष में संपन्न होता है और आज भी इस रामलीला मंच की इतनी महिमा है जो भी भक्त श्रद्धा भाव से मन में मुराद रख मन्नते मांगता है वह इस देव शक्ति मन से जरूर पूरी होती है और इस मंच से अभिनय करने वाले पात्रों की झोलियां जरूर प्रभु भरते हैं जो आज देखने को मिलता है जो आज कई दर्जनों पात्र जो अभिनय किया है आज केंद्र सरकार और राज्य सरकार की नौकरी में सेवा दे रहे हैं और कुछ पात्र सेवा निवृत्त होकर भी अपने रोल कुशल मंचन करते हैं दशहरा पर्व की छुट्टी लेकर जो आज भी अभिनय करने वाले पात्र देश- प्रदेश के कोने-कोने से आकर अपने रामलीला के अभिनय का किरदार निभाते हैं वह मनोवांछित फल प्राप्त करते हैं।

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